रेल्वे में लोग मजिस्ट्रियल चेकिंग से क्यों घबराते हैं, क्या रेल्वे के मैजिस्ट्रेट अलग होते हैं और क्या रेल्वे कोर्ट अलग होती हैं?
जब रेलवे में मजिस्ट्रियल चेकिंग होती है तो किसी भी छोटे स्टेशन पर ट्रेन को आउट आफ कोर्स (अचानक से) रोक कर रेलवे पुलिस द्वारा ट्रेन को चारों ओर से घेर लिया जाता है। फिर रेलवे का चैकिंग स्टाफ हर डिब्बे में चढ़कर सबके टिकिट चैक करते हैं। जो भी बिना टिकिट या गलत टिकिट के साथ पकड़ा जाता है उसे रेलवे मजिस्ट्रेट, जो कि उसी स्टेशन पर आये हुए होते हैं, के सामने पेश किया जाता है। मजिस्ट्रेट पूछते हैं बिना टिकिट क्यों चले, उसके बाद जो उन्हें उचित लगता है वह फाइन सुना देते हैं, आपने न नुकुर की तो फाइन बढ़ाते जाते हैं। यदि आपने तुरंत फाइन भर दिया तो छोड़ दिया जायेगा वरना जेल, जमानत कराओ, फिर केस चलेगा।
फाइन करने के नियम क्या हैं, वह मुझे नहीं मालुम लेकिन वह नारमल टिकिट किराये से बहुत ज्यादा होता है।
रेलवे के मजिस्ट्रेट सिविल कोर्ट से रेलवे में डेपुटेशन पर आते हैं, जैसे कि GRP पुलिस आती है।
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