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Showing posts from April, 2020

ये पाकिस्तानी कहते हैं कि कश्मीर इनका है : Must Read

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एक बार संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को ले कर चर्चा चल रही थी। एक भारतीय प्रवक्ता बोलने के लिए खड़ा हुआ। अपना पक्ष रखने से पहले उसने ऋषि कश्यप की एक बहुत पुरानी कहानी सुनाने की अनुमति माँगी। अनुमति मिलने के बाद भारतीय प्रवक्ता ने अपनी बात शुरू की... "एक बार महर्षि कश्यप, जिनके नाम पर आज कश्मीर का नाम पड़ा है, घूमते-घूमते कश्मीर पहुंच गए। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर झील देखी तो उस झील में उनका नहाने का मन हुआ। उन्होंने अपने कपड़े उतारे और झील में नहाने चले गए। जब वो नहा कर बाहर निकले, तो उनके कपड़े वहाँ से गायब मिले। दरअसल, उनके कपड़े किसी पाकिस्तानी ने चुरा लिये थे..." इतने में पाकिस्तानी प्रवक्ता चीख पड़ा और बोला: "क्या बकवास कर रहे हो? उस समय तो 'पाकिस्तान' था ही नहीं!!!" भारतीय प्रवक्ता मुस्कुराया और बोला:  "और ये पाकिस्तानी कहते हैं कि कश्मीर इनका है!!!"   🇮🇳🇮🇳 😜😂😃 इतना सुनते ही... पूरा संयुक्त राष्ट्र सभा ठहाकों की गूंज से भर उठा।। 😂😝😜👏👏👏 एक हिन्दुस्तानी होने के नाते यह वाकया मुझे बहुत प...

Good By Mom : एक सीख

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गुड बाए मोम : सुपर मार्केट में शॉपिंग करते हुए एक युवक ने नोटिस किया कि एक बूढ़ी अम्मा उसका पीछा कर रही है। वो रुकता तो बूढ़ी अम्मा रुक जाती। वो चलता तो बूढ़ी अम्मा भी चलने लगती। आखिर एक बार वो युवक के करीब आई और बोली---" बेटा, मेरे कारण तुम परेशान हो रहे हो। लेकिन तुम बिलकुल मेरे स्वर्गवासी बेटे जैसे दिखते हो इसलिए मैं तुम्हे देखते हुए तुम्हारे पीछे पीछे चल रही हूँ। " युवक---" कोई बात नहीं, अम्मा जी। मुझे कोई परेशानी नहीं। " बूढ़ी अम्मा---" बेटा, मैं जानती हूँ कि, तुम्हे अजीब लगेगा। लेकिन जब मैं स्टोर से जाऊँ तब क्या तुम मुझे एक बार ' गुड बाय, मॉम ' कहोगे, जैसा मेरा बेटा कहा करता था। मुझे बेहद ख़ुशी होगी, बेटा। " युवक---" जी, जरूर। " फिर, बूढ़ी अम्मा जब बाहर जाने लगी तब युवक ने जोर से आवाज लगाई---" गुड बाय, मॉम। " बूढी अम्मा पलटी और बहुत स्नेह से युवक की तरफ देखा, मुस्कुराई और चली गई। युवक भी बहुत खुश हुआ कि, आज वह किसी की मुस्कान का कारण बन सका। सामान ट्रॉली में रखकर युवक काउंटर पर पहुँचा और...

कोरना : एक सुंदर कहानी | Lookhelper

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Korana: A Beautiful Story आज सुबह की पॉजिटिव रिपोर्ट ने मुझे दो घंटे तक दांव पर लगाकर रखा... सुबह आठ बजे मेरे पड़ोसी ने मेरी बाइक की चाबी मांगी कहा "मुझे लैब से एक रिपोर्ट लानी है।" मैंने कहा - "ठीक है भाई ले जा" थोड़ी देर बाद पड़ोसी रिपोर्ट ले कर वापिस आया। मुझे चाबी दी और मुझे गले लगाया और "बहुत बहुत धन्यवाद" कह कर अपने घर चला गया... जैसे ही वह अपने घर गया, गेट पर ही खड़े हो कर ऊपर वाली मंजिल में काम कर रही अपनी पत्नी से कहने लगा, "भाग्यवान रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है... !!!" जब वह बात मेरे कानों में पड़ी तो मैं गिरते गिरते बचा। घबरा कर मैंने अपने हाथ सैनिटाइज़र से साफ़ किये और बाइक को दो बार सर्फ से धोया, फिर याद आया मुझे उसने गले भी लगया था। मैंने मन में सोचा मारा गया तू तो, तुझे भी अब कोरोना होगा। मैं डेटोल साबुन से रगड़ रगड़ कर नहाया और बाथरूम में ही दुखी हो कर एक कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद मैंंने पॉकेट से फोन निकाला और पड़ोसी को फोन करके बोला - "भाई अगर आपकी रिपोर्ट पॉजिटिव थी तो कम से कम मुझे तो बख्श देते.....

हम लोग की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं ? एक बार अवश्य पढे

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मे इस लेख मे आपको कुछ समय पीछे ले जा रहा हु आशा करता हु आप इस post के द्वारा रोमांचित होंगे  हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी, पहला चरण   -   कैंची  दूसरा चरण    -   डंडा  तीसरा चरण   -   गद्दी ... तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस ताऊ जी, पापा जी या चाचा जी ही चलाया करते थे.(तब हर बड़े के रिश्ते के साथ "जी" लगाने के संस्कार और परम्परा थी ) *तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।* *"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*। और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* । *आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की ...

मृत्युभोज में पंडितों का योगदान!

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मृत्युभोज में पंडितों का योगदान! मैं जब भी मृत्युभोज रूपी सामाजिक कलंक को मिटाने की बात करता हूँ तो अक्सर ब्राह्मण समाज के बंधुओं की शिकायत रहती है कि आप बार-बार इसमें ब्राह्मणों का नाम क्यों घसीटते हो?करते आप हो!बुलाते आप हो और फिर बदनाम करते हो! अक्सर किसी भी पाखंड व अंधविश्वास को स्थापित करने में धर्म का महत्वपूर्ण योगदान होता है।हर कर्मकांड धर्म बताकर ही शुरू किया जाता है।ब्राह्मण ग्रंथों में हर पन्ने में लिखी नैतिकता आपस मे उलझती है।अगर सारांश रूप में कुछ सीखना चाहे तो यह है कि इनमें समय व्यर्थ करने का कोई सार नहीं है। मानता हूँ मृत्युभोज को लेकर ब्राह्मण ग्रंथों में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।उल्टा गरुड़ पुराण में मृत्युभोज को गलत बताया गया है।मगर यह तो मानना पड़ेगा कि किसी भी धर्म के विस्तार की प्रक्रिया में मूल तत्व से जुदा हालातों के हिसाब से मनगढ़ंत बातें जोड़ दी जाती है।यह धर्मगुरुओं की नाकामी रही कि धर्म बताकर अलग-अलग बातें जोड़ते गए मगर कोई स्पष्ट नैतिक संहिता स्थापित नहीं कर पाए। अगर धर्म चलाया है,धर्म की रक्षा का भी दावा कर रहे हो तो फिर आपको बुराइय...