मृत्युभोज में पंडितों का योगदान!
मृत्युभोज में पंडितों का योगदान!
मैं जब भी मृत्युभोज रूपी सामाजिक कलंक को मिटाने की बात करता हूँ तो अक्सर ब्राह्मण समाज के बंधुओं की शिकायत रहती है कि आप बार-बार इसमें ब्राह्मणों का नाम क्यों घसीटते हो?करते आप हो!बुलाते आप हो और फिर बदनाम करते हो!
अक्सर किसी भी पाखंड व अंधविश्वास को स्थापित करने में धर्म का महत्वपूर्ण योगदान होता है।हर कर्मकांड धर्म बताकर ही शुरू किया जाता है।ब्राह्मण ग्रंथों में हर पन्ने में लिखी नैतिकता आपस मे उलझती है।अगर सारांश रूप में कुछ सीखना चाहे तो यह है कि इनमें समय व्यर्थ करने का कोई सार नहीं है।
मानता हूँ मृत्युभोज को लेकर ब्राह्मण ग्रंथों में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।उल्टा गरुड़ पुराण में मृत्युभोज को गलत बताया गया है।मगर यह तो मानना पड़ेगा कि किसी भी धर्म के विस्तार की प्रक्रिया में मूल तत्व से जुदा हालातों के हिसाब से मनगढ़ंत बातें जोड़ दी जाती है।यह धर्मगुरुओं की नाकामी रही कि धर्म बताकर अलग-अलग बातें जोड़ते गए मगर कोई स्पष्ट नैतिक संहिता स्थापित नहीं कर पाए।
अगर धर्म चलाया है,धर्म की रक्षा का भी दावा कर रहे हो तो फिर आपको बुराइयों का ठीकरा भी अपने सिर लेना पड़ेगा।धर्म कोई प्रायोगिक शिक्षा नहीं है जिसमे सफलता/असफलता पर निर्भर करता हो कि आगे काम मे लेना है या नहीं,बल्कि यह मानसिक अवस्था है जिसको संतुष्टि प्रदान करने के लिए आगे से आगे रहस्य दिखाने होते है।
जब 16 संस्कारों में अंतिम संस्कार दाह संस्कार बताया था तो बात वहीं तक खत्म हो जानी चाहिए थी।उससे आगे की जो प्रक्रिया है वो स्वतः स्थापित नहीं हुई है बल्कि पंडितों ने बताया है कि अंतिम संस्कार के बाद अगले दिन सुबह अस्थियां घर लानी है मंत्रोच्चार के साथ बेटों के गले मे डालनी है,हरिद्वार ले जाकर उसका विसर्जन करना है।हर प्रक्रिया में पंडित मौजूद रहता है,मंत्रोच्चार करता है व मृत्युभोज के बाद दक्षिणा लेता है।
अगर दक्षिणा कम हो तो झगड़े तक करता है।यह मैंने अपनी आंखों से देखा है।बेटे लोक-लिहाज से खामोश बैठे रहते है,नाराज होते है मगर बोल नहीं पाते क्योंकि समाज के लोग दक्षिणा की सौदेबाजी करते है।
अगर किसी को लगता है कि पंडित मृत्युभोज में कर्मकांड नहीं करवाते है और इसे धर्म की प्रक्रिया नहीं बताते है तो उसको मृत्युभोज के समय उपस्थित रहना चाहिए।अव्वल बात तो यह है कि मृतकों की आत्मा को पोषण देने के लिए वार्षिक हफ्तावसूली के रूप में श्राद्ध तक का कर्मकांड करते है और दक्षिणा लेते है और इसके लिए बाकायदा कहानियां रची गई है।जब मानव जीवन का अंतिम संस्कार ही दाह संस्कार है तो ये पंडित लोग बाद में कौनसे संस्कार स्थापित कर रहे है?
कोरोना के संकट से जब बिना मृत्युभोज के काम चल रहा है तो फिर ये पढ़े-लिखे प्राचार्य ऑनलाइन दक्षिणा किसके लिए मांग रहे है?ब्राह्मण समाज के लोगों को चाहिये कि वो ऐसे पंडितों व शिक्षकों पर खुद आगे आकर रोक लगाएं।अन्यथा जिनके कंधो पर धर्म का टेण्डर है तो त्रुटियां भी उन्हीं के हिस्से आएगी!मैं तो इनको त्रुटियां भी नहीं मानता क्योंकि यह जानबूझकर धर्म की आड़ में चलाया गया पंडितों का धंधा है।
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